A poem written by a IT professional in frustration of change. As in today India, it necessity to change company after a year or two to grow. Increment are very low these days in services companies even the chances of going abroad ( which is the one of the factor by which IT people became rich ) are poor.
न करू स्विच ?
न करू स्विच ?
अंधियारी निशा का साया
सप्ताह्तं संध्या पर
काम का चरम दबाव
वातानुकूलित लेब मे बैठ
मेरा निशाचरी दिल सोचता हैं
न करू स्विच ??
आउट डेटेड बोस के
घिसे-पिटे वादों से क्षुब्ध
आदिकालिन ख्यालों से आहत
अपने ही दो से प्रतिस्प करता
मेरा सहज दिल सोचता हैं
न करू स्विच ??
काम कि तलाश
जिम्मेदारी कि आस
सम्मान कि कसक मे
टीम दर टीम – प़ोजेकट दर प़ोजेकट
मेरा भटकता दिल सोचता हैं
न करू स्विच ??
नकारे माहोल मे
मक्कारों के बीच
विलुप्त होते प़ोजेक्टस् का साया
घटती कार्मिकों कि तादाद से,
मेरा असुरक्षित दिल सोचता हैं
न करू स्विच ??
आर & डी के लिये हायर्ड
डवलपमेंट से बोझिल
टेस्टिगं मे अटका
छुट्टियों को चिरकाल से प़तिक्षित
मेरा कुंठित दिल सोचता हैं
न करू स्विच ??
बहुराष्ट्रीय आय से सिंचित
वित्त सरिता सी कंपनी
8% इनक़ीमेंट के चने चबाता
आनसाइट के सपने सपनो मे देखता
मूल्यांकन- समीक्षा मे लताडित
मेरा प़ताडित दिल सोचता हैं
न करू स्विच ??
Roses are red, sky is blue, you’re a better writer than me for sure, lol
Спасибо за Ваш труд!!